कभी-कभी खामुशी भी
बहुत कुछ कह जाती है
बंद लबों पे ,
दिल का हर अफसाना ,
आँखों की कलम से ,
खुली किताब की तरह
लिख जाती है
कभी-कभी खामुशी भी
बहुत कुछ कह जाती है
---- शायर " अशोक "
ऐ बादे-सबा किस नूर को लाये हो साथ मे .... आज जीने की फिर से तमन्ना हों चली मुझको !!!! ---- शायर " अशोक " ......... मेरे दिल मे जो भी ख्याल आते हैं , मैं उन्हें लिख देता हूँ ..... आप अपनी कीमती टिप्पणी अवश्य दें || ........... आपकी तारीफ़ और आलोचना , मुझे हमेशा सोचने और लिखने कों प्रेरित करती है ||...... धन्यवाद .......
Sunday, July 17, 2011
Sunday, March 6, 2011
सेंट्रल बैंक की उन्नति का इतिहास नया लिख जायेंगे !!!
हुआ यूँ कि ASSISTANT MANAGER की ट्रेनिंग के दौरान
सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन हुआ और मुझे " सेंट्रल बैंक
और युवा ऑफिसर्स को ध्यान में रखकर, एक जोश और उमंग
से भरी कविता लिखकर सुनाने को कहा गया ||
उसी की विडियो रेकॉर्डिंग आप लोगों के समक्ष
प्रस्तुत कर रहा हूँ ||
सेंट्रल बैंक की उन्नति का इतिहास नया लिख जायेंगे
हम युवा खाते हैं कसम कुछ ऐसा कर जायेंगे ||
--- शायर " अशोक " CBI ASSISTANT MANAGER
Friday, August 6, 2010
एहसास के बादल गरजे हैं सावन की सुलगती रात में फिर !!!
दो दिल मिल कर अब झूमेंगे इस प्यार भारी बरसात में फिर
एक एक कदम पर खौफ यहाँ डर डर के हैं जीते लोग यहाँ
फिर देश पे खतरों का साया हम हैं नाज़ुक हालात में फिर
खुशहाल हुए आज़ाद हुए लोगों की गुलामी खत्म हुई
कुछ देर सभी को याद रहा सब आ ही गए औकात में फिर
सजना तेरे नाम की मेंहदी जब हाथों में रचा डाली उस ने
शहनाई गूँज उठी मन में सपनों वाली बारात में फिर
क्या सोच के तुम पहुंचे थे इधर यूं खाली हाथ 'अशोक'
ये लोग तुम्हारी ही चीज़ें दे देंगे तुम्हें खैरात में फिर .
Tuesday, July 27, 2010
भींगे अश्क़ों में, दिल जला-जला-सा है !!!
दिल का दीया बुझा-बुझा-सा है
कोई हमसे जुदा-जुदा-सा है
कोई हमसे जुदा-जुदा-सा है
तनहा , उदास , खामोश हर लम्हा
मन का आँगन सूना-सूना-सा है
उसकी बेवफाई की दास्तां न पूछो
भींगे अश्क़ों में, दिल जला-जला-सा है
ख़्वाब जो हकीक़त न बन सका
हर ख़्याल का निशां मिटा-मिटा-सा है
टूटी है आरज़ू, आइनें की तरह
"अशोक" गमे-इश्क़ में डूबा-डूबा-सा है
----- शायर " अशोक "
Wednesday, June 23, 2010
एक नन्हा सा दिया माँ ने जला रक्खा है !!!
एक चेहरा है जिसे दिल से लगा रक्खा है
क्या कहूं इश्क में क्या हाल बना रक्खा है
क़ैद में घुटती हुई जीस्त से बेहतर है मौत
डर के जीने में भला ख़ाक मज़ा रक्खा है
राह तकते तेरी आँखों में नमी भी भर ली
और बिस्तर पे गमे-इश्क सजा रक्खा है
लूट कर मेरा सुकूं, गम मुझे देने वाले
तेरा हर जख्म कलेजे से लगा रक्खा है
किस कफस में है ये जुर्रत जो मुझे क़ैद करे
मैं ने हर शाख पे अब खुद को बिठा रक्खा है
जीत जाऊँगा अंधेरों से, यकीं है ये 'अशोक'
एक नन्हा सा दिया माँ ने जला रक्खा है
*क़फ़स -- पिंजरा
------- शायर " अशोक "
Monday, April 12, 2010
मेरे लब है " अशोक " तेरे नाम की ख़ुशबू !!!
इश्क़ की शाख पे खिलती तेरे अन्दाम की ख़ुशबू
है बादे - सबा के लब पे तेरे नाम की ख़ुशबू
मेरी तशनगी बुझा दो , दो घूंट अब पिला दो
ये आँखें हैं मये-मुहब्बत से भरी जाम की ख़ुशबू
जब कामिनी के फूल खिले, शबनम की बूंद तले
फैलती है हर तरफ मये-गुलफाम की ख़ुशबू
चलते रहो तुम राह पे , थकना न कभी हार के
कदम को चूम लेंगी इक दिन मुकाम की ख़ुशबू
ख़ुदा से हर दुआ में बस तुम्हे ही मांगते हैं हम
मेरे लब है " अशोक " तेरे नाम की ख़ुशबू
* अन्दाम -- जिस्म ,
* बादे-सबा -- सुबह की पुरवाई हवा या ठंडी हवा ,
* तशनगी -- प्यास ,
* मये-मुहब्बत -- मुहब्बत रूपी मदिरा ,
* मये-गुलफाम -- फूलों की रंग जैसी मदिरा
--------- शायर " अशोक "
Friday, March 19, 2010
विनती है बेटियों को जन्म लेने से न रोको !!!
नव वर्ष संवत २०६६ के पावन अवसर पर ,
नव युवक ट्रस्ट समिति ( मुजफ्फरपुर )
द्वारा आयोजित कवि सम्मलेन में ,
मेरे द्वारा प्रस्तुत की गई रचना ||
दोस्तों, यह गज़ल, www.jaiyuva.com और
views24hours.com पर
views24hours.com पर
प्रकाशित हुई है , आप पढ़ सकते हैं ...
नोटों से चलती दुनियाँ की रेलगाड़ी है
रिश्वत से बड़ी न दूजी कोई महामारी है
इतने घोटाले हो रहे हैं इस देश में
नेताओं की कुर्सी बनी, काले धन की पिटारी है
चुनाव का मौसम है, हर नेता बने सेवक हैं
एक - एक वोट सब पे पड़ रही भारी है
विनती है बेटियों को जन्म लेने से न रोको
लक्ष्मीबाई भी नारी थी, किरण बेदी भी नारी है
गुनाह के खिलाफ़ मुंह खोलना भी पाप है
ये मंत्र है आज का , कलयुग की दुनियादारी है
....... शायर " अशोक "
Thursday, March 11, 2010
माँ के आँचल तले ज़न्नत का साया है !!!
बेटे ने बाप को खंजर क्यों दिखाया है
मुझको ख़ुदा तूने ये मंज़र क्यों दिखया है
हर रिश्ते - नातों को ख़त्म कर उसने
शक़ की आग़ में खुद को क्यों जलाया है
बिन मौसम बरसात का ये क्या इशारा है
शायद किसी ने किसी के दिल को दुखाया है
पूछी है दोस्तों ने मुझसे मेरी कहानी
मगर क्यों जुबाँ पे तेरा नाम आया है
हर दर्द की दवा , हर ज़ख्म का मरहम
माँ के आँचल तले ज़न्नत का साया है
उस बेबस किसान की दुःख भरी दास्तां सुन
"अशोक" का दिल बहुत दर्द से भर आया है
......... शायर " अशोक "
Saturday, March 6, 2010
नेताओं की कहानी, शायर " अशोक " की जुबानी
नव वर्ष संवत २०६६ के पावन अवसर पर ,
नव युवक ट्रस्ट समिति ( मुजफ्फरपुर )
द्वारा आयोजित कवि सम्मलेन में ,
मेरे द्वारा प्रस्तुत की गई रचना ||
दोस्तों यह रचना ,
http://views24hours.com/news.php?id=574&mid=10&sms_
पर प्रकाशित हो चुकी है ||
आडवाणी जी मंदिर बनवाओगे कब तक
हिन्दुओं को यूँ ही बहलाओगे कब तक
देश की जनता इतनी नादां नहीं है
तुम अपनी रोटी पकाओगे कब तक
मनमोहन जी कुछ अपनी मन की भी कर लो
सोनिया जी की गाड़ी चलाओगे कब तक
पवार जी आपकी हर पोल है खुल चुकी
जनता कों चीनी खिलाओगे कब तक
चिदंबरम जी जनता जवाब चाहती है
आतंकवाद को जड़ से मिटाओगे कब तक
परनब बाबू अर्थवयवस्था का गुणगान करते हो
मंहगाई पर लगाम लगाओगे कब तक
माया जी आप मूर्तियों की बहुत प्रेमी हो
हाथियों की मूर्तियाँ बनवाओगे कब तक
ममता जी और लालू जी रेल के अखाड़े में
लाभ-हानि का किस्सा सुनाओगे कब तक
नितीश जी आप बात करते हो सुशासन की
बिहार से अफसरसाही मिटाओगे कब तक
पासवान जी आप गीत गाते रह गए अल्पसंख्यक की
अल्पमत की मार खुद खाओगे कब तक
इक सवाल "अशोक" देश की जनता से पूछता है
तुम लुटेरों को नेता बनाओगे कब तक
......... शायर " अशोक "
नव युवक ट्रस्ट समिति ( मुजफ्फरपुर )
द्वारा आयोजित कवि सम्मलेन में ,
मेरे द्वारा प्रस्तुत की गई रचना ||
दोस्तों यह रचना ,
http://views24hours.com/news.php?id=574&mid=10&sms_
पर प्रकाशित हो चुकी है ||
आडवाणी जी मंदिर बनवाओगे कब तक
हिन्दुओं को यूँ ही बहलाओगे कब तक
देश की जनता इतनी नादां नहीं है
तुम अपनी रोटी पकाओगे कब तक
मनमोहन जी कुछ अपनी मन की भी कर लो
सोनिया जी की गाड़ी चलाओगे कब तक
पवार जी आपकी हर पोल है खुल चुकी
जनता कों चीनी खिलाओगे कब तक
चिदंबरम जी जनता जवाब चाहती है
आतंकवाद को जड़ से मिटाओगे कब तक
परनब बाबू अर्थवयवस्था का गुणगान करते हो
मंहगाई पर लगाम लगाओगे कब तक
माया जी आप मूर्तियों की बहुत प्रेमी हो
हाथियों की मूर्तियाँ बनवाओगे कब तक
ममता जी और लालू जी रेल के अखाड़े में
लाभ-हानि का किस्सा सुनाओगे कब तक
नितीश जी आप बात करते हो सुशासन की
बिहार से अफसरसाही मिटाओगे कब तक
पासवान जी आप गीत गाते रह गए अल्पसंख्यक की
अल्पमत की मार खुद खाओगे कब तक
इक सवाल "अशोक" देश की जनता से पूछता है
तुम लुटेरों को नेता बनाओगे कब तक
......... शायर " अशोक "
Friday, March 5, 2010
Monday, March 1, 2010
बिन तेरे ऐ सनम, होली खेलें कैसे हम....
बिन तेरे ऐ सनम , होली खेलें कैसे हम
हर रंग फींका लगता है किस रंग से खेलें हम
अब तो दिल भी रोया है , आँखें हुई है नम
यादों की सतरंगी धूप में , मुरझा से गए हैं हम
बिन तेरे ऐ सनम , होली खेलें कैसे हम
अब आ जाओ - अब आ जाओ
इन लम्हों कों रंगीन बना जाओ
चाहत की इक रंग अनोखी ,
उस रंग से हमको रंग जाओ
अब आ जाओ - अब आ जाओ
अब आ जाओ - अब आ जाओ
----- शायर " अशोक "
Sunday, February 28, 2010
इक ख़त लिखूँ तेरे नाम का !!!
दिल पे गुज़रे हालात लिखूँ
तेरी यादों की बरसात लिखूँ
इक ख़त लिखूँ तेरे नाम का
ख़त में अपने ज़ज्बात लिखूँ
मेरी लफ़्ज़ों की तहरीर हो तुम
मैं नग्मों की बारात लिखूँ
मेरी सामो-सहर अब कटती नहीं
क्या दिन लिखूं क्या रात लिखूँ
तन्हाई तले तेरा ख्याल डसे
इक ख़त मे कैसे हर बात लिखूँ
* तहरीर -- लिखावट
*सामो-सहर -- सुबह-शाम
*सामो-सहर -- सुबह-शाम
------ शायर " अशोक "
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