Sunday, December 18, 2011

इश्क की आग में जलने के लिए जिंदा हूँ !!!


इश्क की आग में जलने के लिए जिंदा हूँ 
आग  में  दर्द की पलने  के लिए जिंदा हूँ 


है कठिन  राह  मगर  मुझको  नहीं रुकना है 
मैं तो गिर गिर के भी चलने के लिए जिंदा हूँ 


चाँद दिखता है मगर दूर बहुत है मुझ से 
और  मैं  हूँ कि मचलने के लिए जिंदा हूँ 


तू मुझे लाख भुला, लाख भुला दे लेकिन 
तेरे  कांटे  मैं  कुचलने  के  लिए जिंदा हूँ 


कभी सचमुच तो कभी ख़्वाब की सूरत आ जा 
अपनी  आँखों  को  ही मलने  के लिए जिंदा हूँ 


----- शायर "अशोक" 

20 comments:

अभिजीत said...

Ashok bhai, bahot behtareen gazal hai. Ek shabd mein bolun to shandar. Par ek shikayat hai aap iske saath Apne recorded voice bhi post kijiye..kyonki is gazal ki khubsurti jyada tak hai jab koi ise gakar sunaye.

waise behtareen...yaden taaza ho gayin

sushma 'आहुति' said...

बहुत ही अच्छी रचना....

Abhishek Kumar said...

bahut sunadar bhai sahab...aur apke mukh se sunane ke baad aur bhi behatarin....keep it up....dear........

Rahulkumar said...

Bhai padne apna sur besura ho jata hai jara iska audio ya vedio version upload kijie na mazzzzza aa jayega ......................

avanti singh said...

bahut hi umda aur behtreen rachna...

सर्वत एम० said...

क्या क्या शेर लिख देते हो भाई, मैं तो दंग रह जाता हूँ. सोचता हूँ कुछ दिन तुम्हारी शागिर्दी में आ जाऊं

munna jee said...

कभी सचमुच तो कभी ख़्वाब की सूरत आ जा
अपनी आँखों को ही मलने के लिए जिंदा हूँ


kabiletarif janab............shukriya

munna jee said...

कभी सचमुच तो कभी ख़्वाब की सूरत आ जा
अपनी आँखों को ही मलने के लिए जिंदा हूँ

wah wah wah wah .....bahut hi sunder waqeyat......

amrendra "amar" said...

बहुत खूबसूरत, आनंद आ गया

somali said...

bahut khubsurat sir...

S.N SHUKLA said...

इस ख़ूबसूरत प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकारें.

मेरे ब्लॉग"meri kavitayen" पर भी पधारने का कष्ट करें, आभारी होऊंगा.

Unknown said...

Hello,
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daanish said...

"aur maiN hooN k machalne ke liye zindaa hooN..."
waah
bahut khoob !
mubarakbaad qubool farmaaeiN !!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

है कठिन राह मगर मुझको नहीं रुकना है
मैं तो गिर गिर के भी चलने के लिए जिंदा हूँ

वाह , बहुत खूब ...यही हौसला होना चाहिए ।

JHAROKHA said...

yahi to nischal prem hai jise aapne khoobsurat andaaz me apneprem may shabdo me piro diya hai.
badhai
poonam

Anupama Tripathi said...

तू मुझे लाख भुला, लाख भुला दे लेकिन
तेरे कांटे मैं कुचलने के लिए जिंदा हूँ ..

बहुत प्रबल भाव ...
सुंदर रचना ....
शुभकामनायें ...

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...






प्रिय बंधुवर शायर "अशोक" जी
नमस्ते !

सर्वत साहब ने जिस ग़ज़ल की ता'रीफ़ करदी ,… फिर उस ग़ज़ल के लिए किसी प्रतिक्रिया की आवश्यकता नहीं रहती …
:)
वाकई बहुत ख़ूबसूरत बह्र में बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल है … बधाई !

शुभकामनाओं-मंगलकामनाओं सहित…
- राजेन्द्र स्वर्णकार

Blogvarta said...

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प्रेम सरोवर said...

रूचिकर पोस्ट। मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा।

kumar zahid said...

इश्क की आग में जलने के लिए जिंदा हूँ
आग में दर्द की पलने के लिए जिंदा हूँ

है कठिन राह मगर मुझको नहीं रुकना है
मैं तो गिर गिर के भी चलने के लिए जिंदा हूँ


अच्छी संतुलित रचना। बहुत बहुत बधाई!